Sunday, 1 November 2020

शहतूत का पेड़ (Shehtoot Ka Ped) / A Poem On Mulberry Tree

 

क्या आपने कभी शहतूत खाया है? ये तो जैसे हमारे बचपन का अभिन्न हिस्सा है. कुछ ऐसी ही यादें ताज़ा करने के लिए और उस खट्टे मीठे स्वाद को दुबारा ज़ुबान  पर लाने के लिए विब्ज कंटेंट कार्ट की तरफ से मैं 'शमौना सैमुएल '  का आभार व्यक्त करती हु।  उम्मीद है आपको उनकी ये प्रस्तुति बोहोत पसंद आएगी. अपने कमैंट्स ज़रूर से शेयर करे।  


शहतूत का पेड़ 

शमौना सैम्युएल 


याद है तुम्हें वो शहतूत का पेड़ बड़ा, 
जो हमारी गली के बीच में था खड़ा, 
उसके आगे जाने की इजाज़त नहीं थी, 
हमारी हद वहीं तक सिमटी थी। 

जब उसमें शहतूत आते, तो मेला सा लगा रहता था, 
उसके नीचे, बच्चों का रेला सा लगा रहता था, 
ऊपर चढ़ने का किसी का साहस नहीं होता था, 
उन्हीं से गुज़ारा करते, जो नीचे पड़ा होता था। 

जिस दिन कोई भईया या अंकल पेड़ पर चढ़ जाते, 
हम भी झोली फैला कर नीचे खड़े हो जाते, 
सबके घरों में उस दिन शहतूत की दावत होती, 
कौन कितना खाएगा, माँ - बाप की आफत होती। 


जिसने सबसे ज़्यादा शहतूत लपके, वो ज़्यादा खाएगा, 
जो सबसे छोटा है, वो रो रोके घर सर पर उठाएगा, 
धोकर खाने हैं या नहीं, ये सबकी मरज़ी होती थी, 
कल दुबारा आना है ये बात पक्की होती थी।  

अब न वो शहतूत हैं, न बच्चों का रेला है, 
जाने कौन कहाँ है, खड़ा वो पेड़ अकेला है, 
मन तो करता है कि एक दिन जाएं सब, 
उस पेड़ का शुक्रिया अदा भी करें, 
और उसको गले लगाए हम, 

बचपन में बहुत साथ दिया था उसने, 
मुफ्त में शहतूत खाने का सुख जो दिया था उसने
अब याद करते है उस मीठे स्वाद को 
बचपन में सिमटे शहतूत के पेड़ को। 

धन्यवाद 

3 comments:

  1. Bahot sunder kavita... Dil ko choo lene wale wo purani bachpan ki yadeyen

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    Replies
    1. Thankyou Unknown! Yeh humare bachpan ka ek anokha hissa hai.

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  2. Badi pyaari kavita hai. Aisa laga ki ye sab meri aankhon ke saamne ghata ho.

    ReplyDelete

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